Sunday, October 4, 2020

शरद ऋतुचर्या: स्वस्थ आयुर्वेद जीवनशैली Ayurveda Lifestyle regime in Autumn Season

 शरद ऋतुचर्या: स्वस्थ आयुर्वेद जीवनशैली

A Healthy Ayurveda Lifestyle regime for healthy Body - Mind and Soul...!

Sharad ritu


        जिस तरह से बाहरी वातावरण मे ऋतुए बदलती रहती है वैसे ही हमारे शरीर मे भी बदलाव आते रहते है । आयुर्वेद के लोकपुरुष सिद्धांत के अनुसार जो हमारे भीतर है वही बाहर प्रकृती मे भी है । बाह्य बदलावों का सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है । जिस तरह पेड़ पौधे वातावरण के अनुसार अपने आप मे बदलाव लाते है बिलकुल वैसे ही हमे भी स्वस्थ जीवन के लिए जीवन शैली मे बदलाव लाने जरूरी होते है । इसलिए आयुर्वेद के अनुसार पुरानी ऋतु की दिनचर्या छोड़कर हमे नयी आनेवाली ऋतु की दिनचर्या का अभ्यास शुरू करना चाहिए । जिससे शरीर और वातावरण के बदलाव को संतुलित किया जा सके । आयुर्वेद मे इसीलिए ऋतुचर्या के अध्याय लिखे गए हैं । जहां पर विविध ऋतु अनुसार आयुर्वेदीय जीवनशैली का वर्णन मिलता है । ताज्जुब की बात तो यह है की आज से हजारों साल पहेले लिखी हुई यह जीवनशैली आज के मापदंडो पर भी सत्य साबित होती हुई नजर आती है ।  

        वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु का आगमन होता है । भारतीय कलेंडर के मुताबिक शरद ऋतु भाद्रपद से लेकर कार्तिक माह तक देखि जाती है । जो अगस्त से लेकर ओक्टोबर तक प्रायः देखने मिलती है । समान्यतः यह समय मे श्राद्ध, नवरात्रि, विजयादशमी और शरद पुर्णिमा जैसे त्योहार हम मनाते है ।

अथर्ववेद 


जीवेम शरदः शतम्अथर्ववेद का मंगल श्लोक :

        कई बार हमने सुना होगा की किसी के जन्मदिन पर बुज़र्गों द्वारा जीवेत शरद: शतम -इस तरह का आशीर्वाद दिया जाता है। यह अथर्ववेद से लिया हुआ सूक्त है। हम में से अधिकाँश लोग शायद यह जानते होंगे कि आयुर्वेद भी अथर्ववेद का ही एक उपवेद है अतः यह भी एक वैदिक ग्रन्थ है जिसमें सुख पूर्वक सौ एवं उससे अधिक वर्ष तक जीने की कामना की गयी है । अथर्ववेद की 19 वें खंड के 67 वें सूक्त में ऐसे ही एक मंत्र का वर्णन है जिसे जानना एवं समझना आयुर्वेद को जानने एवं समझने के लिए आवश्यक है :

     

पहला सूक्त :पश्येम शरदः शतम् ।।।।

        अर्थ: हम सौ शरदों को देखें अर्थात सौ वर्षों तक हमारी नेत्र इन्द्रिय स्वस्थ रहे ।

        दूसरा सूक्त :जीवेम शरदः शतम् ।।२।।

      अर्थ : हम सौ शरद ऋतु तक जीयें यानि हम सौ वर्ष तक जीयें।

        तीसरा सूक्त : बुध्येम शरदः शतम् ।।३।।

      अर्थ : सौ वर्ष तक हमारी बुद्धि सक्षम बनी रहे अर्थात मानसिक तौर पर सौ वर्षों तक स्वस्थ रहे ।

        चौथा सूक्त :रोहेम शरदः शतम् ।।४।।

       अर्थ: सौ वर्षों तक हमारी वृद्धि होती रहे अर्थात हम सौ वर्षों तक उन्नति को प्राप्त करते रहे ।

        पांचवा सूक्त : पूषेम शरदः शतम् ।।५।।

       अर्थ : सौ वर्षों तक हम पुष्टि प्राप्त करते रहें, हमें अच्छा भोजन मिलता रहे ।

        छठा सूक्त : भवेम  शरद : शतम् ।। ।।

       अर्थ : हम सौ वर्षों तक बने रहे । यह दूसरे सूक्त की पुनरावृति है ।

        सातवाँ सूक्त : भूयेम शरद: शतम् ।।।।

        अर्थ : सौ वर्षों तक हम पवित्र बने रहें ।

        आठवां एवं अंतिम सूक्त : भूयसी शरदः शतात ।।।।

        अर्थ : सौ वर्षों के बाद भी ऐसे ही बने रहे ।

अर्थात अथर्ववेद का यह मन्त्र ईश्वर से सुखायु एवं दीर्घायु की कामना करने का मंगलकारी मन्त्र है ।

आशीर्वाद 

आइये जानते है क्यो “जीवेम शरदः शतम्” कहा जाता है :

        वर्षाऋतु समाप्त होते-होते सूर्य की प्रखर किरणें धरती पर पडने लगती हैं । तब शरद ऋतु का आरंभ होता है । वर्षाऋतु में निरंतर ठंडे वातावरण से हमारा शरीर मेल खाया होता है । शरद ऋतु का आरंभ होने पर गर्मी के बढने से स्वाभाविक रूप से पित्तदोष बढता है और पित्त रोग की बीमारियाँ ज्यादा होती है । शरद ऋतु मे सब्जियाँ ज्यादा बनती है किन्तु बारिश का पानी पी कर वे कृमि युक्त अवम नमक की मात्र उसमे बढ़ जाती है । जिससे वे विषैली बन जाती है इसलिए उन्हे खाने से भी बीमारी ज्यादा होती है । इसीलिए व्यंग्य से वैद्यों को रोगाणाम शारदी माता अर्थात (रोगियों की संख्या बढानेवाला) शरद ऋतु रोगो की माता ही है, ऐसा कहा गया है । इसलिए अगर यह शरद ऋतु अगर अच्छी तरह – सुखरूप – बिना कोई रोग के कोई व्यतीत करता है तो पूरा साल स्वस्थ ही गुजरेगा ऐसा माना जाता है । अतः जीवेम शरदः शतम्  ऐसा आशीर्वाद दिया जाता है ।


शरद ऋतु वातावरण 


आयुर्वेद के अनुसार शरद ऋतु का वातावरण और शरीर स्थिति :

        शरद्-ऋतु में बादल विरल हो जाते हैं, वे बहुत धवल स्वच्छ और सुन्दर होते हैं। चंद्रमा की किरणें अधिक प्रभावशाली, स्वच्छ और स्निग्ध हो जाती हैं और मन को आनन्द प्रदान करती हैं। नदियों, झीलों और तालाबों का जल सूर्यताप व चाँदनी के प्रभाव से स्वच्छ हो जाता है।  

                वनस्पतियों, औषधियों आदि में अम्ल रस की अधिकता पाई जाती है। वर्षा-ऋतु में शरीर को वर्षा और उसकी शीतलता सहन करने का अभ्यास हो जाता है। वर्षा के बाद शरद्-ऋतु में सूर्य अपने पूरे तेज  तथा गर्मी के साथ चमकता है। इस उष्णता के फलस्वरूप वर्षा ऋतु के दौरान शरीर में जमा हुआ पित्त दोष एकदम कुपित हो जाता है। इससे रक्त दूषित हो जाता है। परिणामस्वरूप पित्त और रक्त के रोग, बुखार, पेट की जलन, फोड़े-फुंसियाँ, त्वचा पर चकत्ते, गण्डमाला, खुजली आदि विकार अधिक उत्पन्न होते हैं। विसर्ग काल का मध्य होने से शरीर में बल की स्थिति मध्यम होती है ।


आयुर्वेद अनुसार शरद ऋतु दिनचर्या :

·     भूख लगने पर ही आहार ले और पूर्व में खाया हुआ भोजन पच जाने के बाद मात्रा-पूर्वक सेवन करना चाहिये ।

·     अच्छी तरह भूख लगने पर सम्यक मात्रा में ही खाना उपयोगी है ।

·     कुपित पित्त को शान्त करने के लिए घी सेवन हितकारी है । सब्जी – दल की जोंक मे तेल की जगह घी का इस्तेमाल करे । रात को सोते वक़्त पैरों में घी घिसना चाहिए ।

·     शरद ऋतु मे मधुर ( मीठे ), तिक्त ( कडवे ) और कषाय ( तूरे ) स्वाद का विशेष सेवन करना चाहिए ।

·     मीठे, हल्के, सुपाच्य, शीतल और तिक्त रस वाले खाद्य और पेय पदार्थ विशेष रूप से उपयोगी हैं।

·     अनाज मे शालि चावल, मूँग, गेहूँ, जौ, धान , सामा ( एक प्रकार का अनाज ) लेना चाहिए ।

·     दलहन में चने, तुअर , मुंग, मठ , मसूर, मटर लें सकते है ।

·     उबाला हुआ दूध, दही, मक्खन, घी, मलाई, श्रीखंड ( घर पर बना हुआ ) पाचन शक्ति अनुसार ले सकते है ।

·     सब्जियों में- गोभी, ककोड़ा, (खेखसा), परवल, गिल्की , ग्वारफली, गाजर, मक्के का भुट्टा , तुरई, चौलाई, लौकी, कद्दू, सहजने की फली, सूरन  (जमीकंद), आलू लेना चाइए ।

·     फलों में- अनार, आँवला सिंघाड़ा, मुनक्का और कमलगट्टा लाभकारी हैं।

आँवले को शक्कर के साथ खाना चाहिए।

·     काली द्राक्ष (मुनक्के), सौंफ एवं धनिया को मिलाकर  बनाया गया पेय गर्मी का शमन करता है !

·     ठंडाई के लिए तुलसी के बीज अथवा उशीर  डाला हुआ पानी, आमला शरबत आदि विकल्प भी इस ऋतु के लिए लाभदायक हैं ।

·     मिट्टी की मटकी में शरीर को आवश्यक खनिज मिलते हैं । यह पानी पित्तशामक होता है । मिट्टी से शरीर को आवश्यक खनिज  भी मिलते हैं ।

·     हंसोदक जल : इस ऋतु में जल को दिन के समय सूर्य की किरणों में तथा रात्रि को चंद्रमा की किरणों में रख कर प्रयोग में लाना चाहिए। इस ऋतु में जल अगस्त्य तारे के प्रभाव से पूरी तरह विष व अशुद्धि से रहित हो जाता है और सब दृष्टि से बहुत उपयोगी होता है, इसलिए अमृत के समान माना जाता है। पीने के अतिरिक्त स्नान और तैरने के लिए भी इसी जल का उपयोग करना हितकर है। आचार्य चरक ने इस जल को हंसोदक कहा है। 

हंसोदक जल 


·     इस ऋतु में खिलने वाले फूलों को आभूषणों के रूप में प्रयोग में लाना चाहिए। सुगंधित फूल पित्तशमन का कार्य करते हैं ।

·     वस्त्र सूती, ढीले तथा उजले/श्‍वेत रंग के होने चाहिए ।

·     ऋतु में पित्त का प्रकोप होकर जो बुखार आता है, उसमें एकाध उपवास रखकर धनिया पावडर, चंदन, वाला (खस) एवं सोंठ डालकर उबालकर ठंडा किया हुआ पानी पीना चाहिए । व्यर्थ जल्दबाजी के कारण बुखार उतारने की दवाओं का सेवन न करें अन्यथा पित्त अवम यकृत से संबन्धित नये-नये रोग होते ही रहेंगे। आजकल कई लोगों मे इस बात को होते हमने देखा है । इसके लिए आपके आयुर्वेद विशेषज्ञ से सलाह ले ।

·     शरद ऋतु में स्नान से पहले नियमित रूप से शरीर को नारियल तेल लगाने से त्वचा पर फोडे नहीं होते । गर्मी के कारण अधिक पसीना आने के विकार में भी संपूर्ण शरीर को नारियल तेल लगाना लाभदायक है ।

·     कुपित पित्त और दूषित रक्त को शान्त करने के लिए विरेचन (दस्तावर औषधि) का प्रयोग और रक्त-मोक्षण‘ (दूषित रक्त को निकालने) वाली चिकित्सा आयुर्वेद डॉक्टर की सलाह से करनी चाहिए।

 

शरद ऋतु मे निषेध बाते :

·     शरद ऋतु में अतितीक्ष्ण, अम्ल, उष्ण पदार्थ नहीं खाने चाहिए ।

·     ठूँस-ठूँस कर नहीं खाना चाहिए । भूख लगे बिना भोजन नहीं करना चाहिए।

·     बाजरा, मक्का, उड़द, तिल, सरसों, मट्ठा, इमली, कच्ची कैरी,  पुदीना,  सौंफ, मेथी, लहसुन, बैंगन, करेला, भिंडी, ककड़ी,  हींग, मूँगफली, काली मिर्च आदि शरद ऋतु मे त्याज्य होता है ।

·     तेज मादक द्रव्य, मदिरा, सॉफ्ट ड्रिंक्स, दही और लवण वाले खाद्य पदार्थ अधिक मात्रा में नहीं खाने चाहिए।

·     अधिक व्यायाम तथा सम्भोग भी हानिप्रद हैं।

·     फ्रीज अथवा कुलर का ठंडा पानी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने से त्याज्य है ।

·     दिन में सोना या धूप में देर तक बैठना, रात में देर तक जागना ठीक नहीं होता। शरद ऋतु में हालाँकि धूप सेंकना अच्छा लगता है, किन्तु धूप में बहुत देर तक बैठना स्वास्थ्य के ठीक नहीं होता। 

·     इस मौसम में धूप, ओस और पूर्व की ओर से आने वाली हवाओं से बचना चाहिए।

 

शरद ऋतु के दौरान त्योहार का वैज्ञानिक महत्व :

·     इस ऋतु में पित्तदोष की शांति के लिए ही आयुर्वेद के शास्त्रकारों द्वारा खीर खाने, घी का हलवा खाने तथा श्राद्धकर्म करने का आयोजन किया गया है।

·     शरीर मे पित्त शमन के उद्देश्य से चन्द्रविहार, गरबा नृत्य तथा शरद पूर्णिमा के उत्सव के आयोजन का विधान है।

शरद पूर्णिमा 


·     नवरात्रि के दौरान रात्री जागरण से चंद्र की शीतलत से शरीर मे पीत दोष का संतुलन बना रहेता है । रात्री जागरण अच्छा है किन्तु रात्रिजागरण 12 बजे तक या उससे भी पहेले का ही माना जाना चाहिए । अधिक जागरण से और सुबह एवं दोपहर को सोने से त्रिदोष प्रकुपित होते हैं जिससे स्वास्थ्य बिगड़ता है।

·     श्राद्ध के दिनों में 16 दिन तक दूध, चावल, खीर का सेवन पित्तशामकहोता  है। 

·     हमारे दूरदर्शी ऋषि-मुनियों ने शरद पूनम जैसा त्यौहार भी इस ऋतु में विशेषकर स्वास्थ्य की दृष्टि से ही आयोजित किया है। शरद पूनम के दिन रात्रिजागरण, रात्रिभ्रमण, मनोरंजन आदि का उत्तम पित्तनाशक विहार के रूप में आयुर्वेद ने स्वीकार किया है।

·     शरदपूनम की शीतल रात्रि छत पर चन्द्रमा की किरणों में रखी हुई दूध-पोहे अथवा दूध-चावल की खीर सर्वप्रिय, पित्तशामक, शीतल एवं सात्त्विक आहार है।

·     शरद पूनम की रात्रि में ध्यान, भजन, सत्संग, कीर्तन, चन्द्रदर्शन आदि शारीरिक व मानसिक आरोग्यता के लिए अत्यंत लाभदायक है।

इस प्रकार अगर शरद ऋतु मे हमने आयुर्वेद के इन नियमों का पालन किया तो यकीनन इस ऋतु के दौरान होते रोगों से हम बच पाएंगे । और अगर हमारी शरद ऋतु अच्छे से बीत गयी तो “जीवेम शरदः शतम्” जरूर से सार्थक हो पाएगा । आप सभी को मेरी और से मंगल शुभकामनाए :जीवेत शरद: शतम ....!

- डॉ. जिगर गोर ( आयुर्वेद विशेषज्ञ )

श्री माधव स्मरणम आयुर्वेद क्लीनिक, 

भुज- कच्छ, गुजरात 


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Sunday, September 27, 2020

कोरोना की आयुर्वेद औषधियों का सेवन डॉक्टर की सलाह के बाद ही ले

 कोरोना की आयुर्वेद औषधियों का सेवन डॉक्टर की सलाह के बाद करे । Self Medication से आपको तकलीफ हो सकती है :

              कोरोना इन्फ़ैकशन को फैले हुए करीब करीब 8-9 महीने अब भारत मे होने आए है । COVID:19 इन्फ़ैकशन की वजह से पूरा विश्व एकजूट होकर लड़ रहा है । कई जगह कुछ कुछ काबू मे आया हुआ कोरोना , बहोत सारी जगह पर बेकाबू भी बन गया है । आयदिन नए नए हॉट स्पॉट बन रहे हैं । social media मे अब RIP सुनने पर दिल एक धड़कन चूक जाता है की अब किसके अपमृत्यु का समाचार सुनना पड़ेगा । चारो और एक डर का माहोल बन गया है । एक छुपे हुए डर के नीचे हरकोइ जी रहा है । साथ ही जीवन निर्वाह चलाने के लिए, अपने काम को लेकर लोग बाहर भी निकल रहे हैं । कुछ लोग बेखौफ होकर घूम रहे है तो कुछ लोग डर के मारे घर का आँगन भी नहीं देखते है ।

Covid19


              आयुर्वेद के द्वारा covid19 संक्रामण किस तरह काबू मे आ सके उसके लिए बहोत सारे उपाय शुरू से विशेषज्ञों ने बताए हैं । आयुष डिपार्टमेंट द्वारा भी यह चिकित्सा के निर्देशों का किस तरह पालन किया जाए उसके लिए मार्गदर्शिका भी जारी की गई है । आयुर्वेद से रोगप्रतिकरक शक्ति बढ़ाने पर कोरोना से बचा जा सकता है यह बात सामने आने पर के साथ ही social media से लेकर print media तक सब जगह आयुर्वेद के अलग अलग चिकित्सा और नुसख़ों का ज़ोर शोर से प्रचार हुआ है । इन दिनों मे आयुर्वेद के प्रति लोगों की श्रद्धा ओर ज्यादा प्रबल हुई है । बतौर आयुर्वेद चिकित्सक मैंने यह महसूस किया की ज्यादा से ज्यादा लोग आयुर्वेद के विभिन्न नुस्खे और चिकित्सा इन दिनों मे अपनाने लगे है ।  

              लेकिन डर एक ऐसी बात है जो हमे कोई भी हद तक जाने के लिए मजबूर कर देती है । और उसमे भी किसी virus से संक्रमित होकर उससे अप्राकृतिक मृत्यु पाना या अपने किसी नजदीकी स्वजन को गंवाना इस बात से भयावह और डरावना और क्या हो सकता है ? यही डर की वजह से लोगो ने आयुर्वेद के विभिन्न उपचारों को घर पर अपनाना शुरू कर दिया । अपनाने तक तो अच्छा ही था, लेकिन एक हद से ज्यादा ही उसका प्रयोग आजकल हो रहा है यह मालूम पड रहा है । social media पर तो हर कोई जैसे आयुर्वेद का डॉक्टर बन कर बैठा है । सभी लोग कही सुने – पढे हुए भिन्न भिन्न आयुर्वेद नुस्खों को फॉरवर्ड कराते हुए इनबॉक्स को भर दे रहे है ।

Ayurveda Medicine


              लोग कहेते-मानते है की आयुर्वेद दवाइया खाने से उनकी side effects नहीं होती है । मैंने मेरे Facebook Page पर और हमारी वैबसाइट पर और न जाने कितनी ही जगह पर यह बात की होगी की साइड इफैक्ट का आधार दवाइयोंको आप कैसे ले रहे हो इस पर रहेता है । आयुर्वेद की औषधियों का भी साइड इफैक्ट होता है अगर वो उसकी योगी मात्रा से ज्यादा या कम ली जाए या किसी qualified डॉक्टर से परामर्शके  बगैर ली जाए ।

              COVID19 के चलते लोक डाउन लगा और उसके बाद unlock के new normal के वातावरण मे एक नयी दिनचर्या लोगोने अपनाई । अब कोरोना के इन्फ़ैकशन से बचने के लिए लोगो ने ज्यादा से ज्यादा नुस्खो और उपचारों को अपनाना चालू किया ।

Ayush Kwath


              रोगप्रतीकारक शक्ति को बढ़ाने की मानो एक दौड़ ही शुरू हुई है । हल्दी, कालीमिर्च , तुलसी जैसी गर्म चिज़े इन्फ़ैकशन को काबू मे लाकर सर्दी कफ आदि को काबू मे कर सकती है ऐसा मार्गदर्शिका मे कहा गया था । इसके लिए लोग रसोई घर मे ही मिलने वाले काली मिर्च, अदरक – शुंठ चूर्ण, तुलसी आदि को लेने लगे हैं  । इसके चलते सभी गरम-तेज मसलों को उबालकर या खाने मे लेने के अलग अलग नुस्खे प्रचलित हो गए । लोगो ने यह एकदम ही गर्म गुणवाले औषधोंका सेवन खुद की प्रकृति समजे बिना ही चालू कर दिया । दिन मे दो – तीन बार यह गरम चीज़ें हररोज – महीनों तक बेहिसाब लेते रहेने से एसिडिटि , कोलयटिस , पेट का दर्द , सिरदर्द, उल्टी होना, बालों का जड़ना, त्वचा विकार जैसी कई सारी समस्या अब सामने आने लगी हैं । सौंठ के पाउडर को सूंघना और उसको मुंह मे रखकर खाने के नुस्खे से कई लोगों को चक्कर आना, सिरदर्द होना आदि दिक्कते भी होने लगी हैं । ज्यादा गरम चीजों के सेवन से कई महिलाओ को मासिकधर्म से जुड़ी समस्या ज्यादा बढ़ गई हुई भी हमारी OPD मे दिखाई दे रही है । हल्दी ने तो मानो सारे रिकॉर्ड ही ब्रेक कर दिये है । सारे साल मे हम जितनी हल्दी नई खाते हैं उससे चार  – पाँच गुनी ज्यादा हल्दी हम इन चंद महीनों मे खा गए हैं । और अभी भी उसकी डिमांड बरकरार है । थोड़े ही दिनों मे हल्दी का कालाबाज़ार न हो तो ही गरिमत है ।

Turmeric Milk


              हल्दी हो या तुलसी हो या सोंठ हो या और कोई वनस्पति तब ही औषधीय गुण देगी जब उसे कोई आयुर्वेद के जानकार qualified doctor द्वारा कही जाए ।  जब वो कोई डिग्रीधरक आयुर्वेदिक वैद्य द्वारा निर्देश की जाए तो उसके पीछे का logic सामान्य से काफी अलग रेहता है । हर किसी को गर्म औषधी समान रूप से गुण नहीं देती है  । औषधियों की मात्रा व्यक्ति की उम्र, वातावरण, प्रकृति , स्त्री-पुरुष आदि factors को ध्यान मे रखते हुए निर्देशित की जाती है । Social Media पर कहे सारे नुस्खे सही ढंग से सूचित किए है या नहीं यह भी कभी जानने की कोशिश ही नहीं की है  । उनकी प्रामाणिकता जाने बिना ही लोगोने वे नुस्खे अपना लिए । कुछ लोगो ने  तो मानो की पेट मे आगा ही लगा दी है । गर्म चिज़े इन्फ़ैकशन को काबू मे ला सकती है , लेकिन उनकी मात्रा हर एक के शरीर के हिसाब से अलग अलग होगी ना ! और फिर बिना परामर्श लिए उनको अपनाने से आए विपरीत परिणामो से परेशान होकर लोगो ने आयुर्वेद को कोसना चालू किया । इच्छित परिणाम नहीं मिलने की वजह से उनका आयुर्वेद के प्रति विश्वास डगमगाने लगा ।

गलत तरीके से औषधि लेने पर तकलीफ 


              सही कहूँ तो, लोगो को हजारो सालो से शाश्वत, सपूर्ण  विकसित और परिपूर्ण ऐसे आयुर्वेद विज्ञान पर भरोसा नहीं है । आयुर्वेद को अपनाने के पीछे उनकी श्र्द्धा और डर से कही आगे है उनका “blindly follow” करने की आदत ! आयुर्वेद का नाम आते ही आंखे बंद करके उन्हे लोग अपनाने लगते है । आजकल तो हर कोई तीसरा आदमी बिना किसी अनुभव लिए social media पर डॉक्टर बन बैठा है, वे आयदिन नए नए नुस्खे और उपचार आयुर्वेद के नाम पर लोगो पर थोप रहे हैं ।  लोगो को आयुर्वेद उपचारो से ठीक होना है , किन्तु उसके लिए  social media मे viral हो रहे आयुर्वेद के नुस्खे ही अपनाने है । आयुर्वेद के डॉक्टर को परामर्श की फीस ना देनी पड़े उसके चक्कर मे लोगो ने अपने आप दवाइयाँ लेना शुरू कर दिया है । उनको अपने स्वास्थ्य के लिए प्रकृति का परीक्षण करवाके आयुर्वेद के डॉक्टर से परामर्श लेकर आयुर्वेद की औषधी खाने मे interest नहीं है । आजकल तो कुछ रुग्ण ऐसे भी हैं की जो सिर्फ डॉक्टर से सलाह लेने लिए या किसी बीमारी के सुजाव के लिए फोन पर या whatsapp पर मेसेज से बात करते है, बस बाकी का काम तो अभी भी मेडिकल स्टोर से ही हो जाता है ।

              काफी मेडिकल स्टोर वालों ने भी मौके का फाइदा उठाकर आयुर्वेद दवाइयाँ लोगों को बेचे जा रहे हैं और उसकी मनचाहे dose भी अपने आप बता दे रहे है । औषधि अगर उसकी मात्रा से ली जाए तब ही तो अपना सही असर दिखाएगी । जो चीजों की आदत शरीर को इतने समय तक बिलकुल नहीं थी उनकी अचानक से बहोत सारी मात्रा शरीर मे जाएगी तो भी  शरीर उसको  कैसे adjust कर पाएगा । वो औषध चाहे कितनी भी अच्छी हो उसका प्रयोग धीरे धीरे समजदारी से – सलाह लेकर करना ही जरूरी है ।

Yoga


              वैसी ही बात योग- प्राणायाम और कसरत के बारे मे हुई है । योग यह आयुर्वेद का अभिन्न अंग है । आजकल तो टीवी पर / social media पर कितने सारे योगगुरु बन बैठे है और खुदकी भिन्न भिन्न योग की पद्धतियाँ बना कर chocolate की तरह बेच रहे है । और उनके शिष्य  भी उनसे अभिभूत होकर हजारो रुपए देकर उन्हे follow भी कर रहे हैं । वैसे योग तो एक विज्ञान है, उसकी पद्धति और मुख्य विचारधारा एक ही है, फिर उसकी अलग अलग पद्धतियाँ कैसे अस्तित्व मे आ गयी ये तो एक डिबेट का विषय रहेगा । लेकिन यह बात का मैं खुद साक्षी हूँ की, इतने समय तक सरल ढंग से किए जाने वाले योग क्रिया को बार बार गला फाड़ कर कहे जाने पर भी काफी रुग्ण ने योग प्राणायाम कतह ही नहीं अपनाए है । और अब अचानक उनका अतियोग होने लगा है । कोई भी कसरत या योग को करने से पहेले शूक्ष्म क्रिया करनी पड़ती है । कसरत और योग-प्राणायाम को अपनाने की एक सही विधि और नियम होते हैं ।  शरीर के स्नायु जो अभी तक कभी भी योग का “य” भी नहीं देखा है उन्हे अचानक से दिन के 1-2 घंटे कसरत करवाने से क्या नतीजा आयेगा ? वैसे भी सभी योग या प्राणायाम या कसरत सभी के लिए नहीं बने है । यहा तो हररोज कौन किस से ज्यादा संख्या मे योग कर पायेगा इसकी स्पर्धा हो रही है । लेकिन इसके नियमों को जाने बिना ही बेढंग योग या कसरत या प्राणायाम करने से उन्हे काफी परेशानियाँ भी दिख रहीं है । और नतीजो का दोष दिया जाता है पूरे system को !



              कई बार तो ऐसा भी हुआ है की जब इस तरह से गलत तरीके या गलत नुस्खों को ना अपनाने का अनुरोध हम आयुर्वेद डॉक्टर द्वरा किया गया तो लोगो ने उल्टा डॉक्टर को ही दोषित ठहराया है । और कहा की, शायद डॉक्टर ज्यादा महेंगी दवाई देना चाहते है इसलिए वो हमारे नुस्खों और औषधियों का विरोध कर रहे है ....!

              खुद की नासमजी के कारण अपनाए हुए नुस्खो से मिले विपरित  परिणाम से आयुर्वेद विज्ञान कतह ही खराब या बिन-असरदार नहीं हो जाता है । यह वो व्यक्ति की गैरजिम्मेदारी थी जिससे उसे हानी हुई है । इसमे पूरी system खराब नहीं होती है ये खास समज़े ।

Ayurveda Medcine


             आईए कुछ खास बातों का ध्यान रखें:


· हमेशा योग्य आयुर्वेद चिकित्सकों से सलाह लेनी चाहिए। अपनी  हररोज की समस्या के लिए उनसे सलाह लें।

· आयुर्वेद फिजिशियन आपका फैमिली फिजिशियन हो सकता है। आपकी छोटी मोटी दिक्कतों के लिए उनसे मशवरा लें।

· आयुर्वेद विशेषज्ञों की राय के बिना सोशल मीडिया के किसी भी उपाय का पालन न करें।

· आयुर्वेद डॉक्टरों  की सलाह और प्रेस्क्रिप्शन के बाद ही कोई दवा लेनी होगी।

· आयुर्वेद की दवाओं के साइड इफेक्ट्स होते हैं, अतः ख़ुद से जाकर मेडिकल स्टोर से दवाई लेकर स्व-चिकित्सा करना बंद करें।

· घरेलू उपचार आयुर्वेद का हिस्सा हैं, यह कुछ हद तक आपकी राहत दे सकता है लेकिन वे पूर्ण रूप से आयुर्वेद उपचार नहीं हैं। सम्पूर्ण आयुर्वेद चिकित्सा के लिए आयुर्वेद विशेषज्ञ से ही औषध ले।

· आपके शरीर की प्रकृति को जाने बिना किसी भी घरेलू उपचार का सेवन न करें।

· मेडिकल स्टोर्स से सीधे दवाइयाँ खरीदना आपको स्वास्थ्य संकट में डाल सकता है।

· योग और व्यायाम दैनिक दिनचर्या का हिस्सा होना चाहिए। लेकिन प्रारंभिक चरण में, विशेषज्ञों की सलाह से ही इसे करना चाहिए।

· किसी भी योग आसन या एक्सर्साइज़ को उसके नियम और व्यक्ति की शरीर की आवश्यकता और प्रकृति के अनुसार किया जाना चाहिए।

· आयुर्वेद एक विशाल विज्ञान है। अगर किसी को मनोवांछित परिणाम नहीं मिला है तो उसका मतलब यह नहीं है कि संपूर्ण विज्ञान अच्छा नहीं है। एक दूसरी राय भी लेनी चाहिए।

· ऐसी कोई एक ही "जादुई जड़ी बूटी या उपाय" दुनिया में नहीं है। आयुर्वेद विशेषज्ञों की सलाह के बिना अत्यधिक खुराक में एक विशेष दवा का सेवन न करें।

              गहेने बनाए के लिए क्या आप लुहार के पास कभी गए हो ? गहेने बनाए के लिए तो हम सुनार के पास ही जाते हैं  ना ! फिर हमारे अमूल्य स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए ज्यों त्यों नुस्खे अपनकर क्यूँ गलत दिशा पकड़ रहे हैं ? सही दिशा का चयन करे, आप जरूर से अपनी मंज़िल को पाएंगे ।

              Master Stroke: If your doctor prescribe you medication without first asking about your diet, sleep – exercise routine, water consumption, whether you have any structural issue or stress in life,,,,Then you  haven’t got a doctor. What you have is drug dealer …!


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Saturday, September 19, 2020

दहीं का आयुर्वेदीय महत्व और दुष्प्रभाव

Health Benefits Of Curd, Uses And Its Side Effects

दहीं और उसका महत्व

                दहीं यह सबको प्यारा होता है । बच्चों से लेकर बड़ों तक दहीं की लोकप्रियता बहोत बड़ी है । शायद एसा कोई ही होगा जिसे दहीं अच्छी लगती ना हो । दहीं की वजह से भोजन के स्वाद की बढोती होती है जिससे हर बड़े और बच्चे का लगाव दहीं की तरफ खास जुका हुआ होता है ।

                भारत के सभी प्रांतो मे दहीं का उपयोग कीसी न कीसी तरहा से किया जाता है। भारत मे तो दहीं और शक्कर किसी शुभ कार्य की शुरुआत में शुगून के तौर पर खाया जाता है, विद्यार्थियों को उनकी परीक्षा देने से पहेले भी दहीं और शक्कर दिया जाने का एक रिवाज है ।



क्यों दहीं और शक्कर शुभ कार्य के पहेले खाया जाता है ?

                घर से बाहर जाते वक़्त या शुभ कार्ये से पहेले दहीं शक्कर खाने का भारतीय रिवाज सालों से प्रचलित है । कुछ लोग मानते हैं की दहीं शक्कर खाने से यह सकारात्मक बल बढ़ता है और नकारात्मक बातों को शरीर और मन से दूर रखता है ।  लेकिन यह दहि शक्कर के रिवाज के पीछे एक वैज्ञानिक अभिगम भी है यह बहोत कुछ लोग ही जानते होंगे, और इसलिए वे इसे अंधश्रद्धा समजकर दहीं शक्कर को नहीं खाते है  

                दही आपके शरीर के लिए प्राकृतिक शीतलता देने का काम करता है, जो गर्मी से लड़ने में मदद करता है। आपको यह अच्छे से पता होगा की , चीनी / मिश्री  यह  ग्लूकोज का एक आवश्यक स्रोत है, जिससे आपके शररी के कोषों को ऊर्जा मिलती है । जब आप दहीं और शक्कर एक साथ लेते हैं, तो इसका आपके शरीर पर जादुई असर होता है। यह आपकी चिंता दूर करके आपको ठंडा और सराबोर करता है, आपको ऊर्जा की एक त्वरित खुराक देता है । इसलिए यह खाने से आप खुद को ऊर्जावान और प्रसन्नता का अनुभव करते हैं ! यही कारण है कि दहीं चीनी छात्रोंको भी दिया जाता है जो परीक्षा दे रहे हैं। किसी भी परीक्षा या तनावपूर्ण घटना के दौरान हम आहार और पोषण के बारे मे ध्यान नहीं रखते हैं । ऐसे समय में, दही-चीनी कार्य को करने के लिए आवश्यक ऊर्जा के साथ शरीर को ईंधन देता है और पोषण का ध्यान रखता है। तो अब आप जान गए होंगे की दहीं शक्कर के पीछे का वैज्ञानिक तथ्य क्या है । अब जब कोई आपको दहीं शक्कर खाने के लिए दे तो मना मत करना !

दहीं को कैसे जमाये :

                दहीं को जमाने की लिए दूध का शुद्ध होना जरूरी है । जितना ज्यादा पानी दूध मे रहेगा उतना ही दहि अच्छे से नहीं जमेगा । दूध को जमाने से पहेले एकबार उसे  अच्छे से गर्म जरूर से कर लें । मिट्टी के पात्र मे जमाया हुआ दहीं बहोत अच्छा जमता है । जमते वक़्त दूध ज्यादा गर्म या ज्यादा ठंडा नहीं होना चाहिए । दूध मे जामन ( थोड़ा सा दहीं ) अच्छी तरह से घोलकर ले ।  ठंडे मौसम मे दहीं जल्दी नहीं जमता है, इसलिए दूध मे ज्यादा जामन (दहीं ) डाले। दो रात्री से अधिक जमाया हुआ दहि खट्टा बन जाता है । याद रखें के फिटकरी / नींबू या कोई खट्टी चीजों को डालकर जमाया हुआ दहीं खट्टा बनता है और सेहत के लिए नुकसान देय भी होता है ।

                गाय के दूध से बना दहीं पचने मे आसान होता है  और भैंस के दूध से बना हुआ दहीं लंबे समय के बाद पचता है और कफ को बढ़ता है ।

दहीं के गुण क्या होते हैं :

                आयुर्वेद के प्राचीनतम ग्रंथ चरक संहिता मे दहीं के गुणों का वर्णन इस तरह से पाया जाता है :

रोचनं दीपनं वृष्यं स्नेहनं बलवर्धनम्।

पाकेऽम्लमुष्णं वातघ्नं मंगल्यं बृंहणं दधि । । २२५। ।

शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम्। -चरक संहिता सूत्रस्थान 27

        अच्छी तरह से जमी हुई दहि भोजन मे रुचि उत्पन्न करती है । दहीं पाचन शक्ति को जगाने वाली और वीर्यवर्धक होती है । यह पचने के बाद खट्टी बनती है और उसके गुणधर्म गर्म होते है । दहीं वायु दोष का नाश करने वाली, मंगलकारी और स्थूलता प्रदान कारक होती है । शरद, ग्रीष्म और वसंत ऋतु मे दहीं पीना वर्ज्य होता है ।

दही या दूध के जीवाणु किण्वन ( fermentation ) द्वारा बनाया जाता है। दही बनाने के लिए उपयोग किए जाने वाले बैक्टीरिया को "curd culture " कहा जाता है, जो दूध में पाए जाने वाले प्राकृतिक शर्करा के रूप में होता है। यह किण्वन ( fermentation ) प्रक्रिया लैक्टिक एसिड का उत्पादन करती है, एक ऐसा पदार्थ जो दूध प्रोटीन को रूखा बनाता है, जिससे दही को इसका अनूठा स्वाद और बनावट मिल जाता है।

दहीं के TOP5 फायदे :

1.    महत्वपूर्ण पोषक तत्व : दही में लगभग हर पोषक तत्व होता है जिसकी आपके शरीर को जरूरत होती है। यह बहुत सारे बी विटामिन - विशेष रूप से विटामिन बी 12 और राइबोफ्लेविन, दोनों के लिए जाना जाता है । फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, पोटेशियम कैल्शियम आदि आवश्यक खनिज भरपूर मात्र मे दहीं पाये जाते हैं । बस एक कप दहीं आपके दैनिक कैल्शियम की जरूरत का 49% प्रदान करता है।

2.    नेचरल प्रोटीन : दही प्रोटीन की एक प्रभावशाली मात्रा प्रदान करता है, जिससे हमारे शरीर की बहोत सारी मुख्य क्रियाने सही ढंग से हो पाती हैं ।

3.    पाचक क्रिया : दहि पाचनक्रिया मे सहायक रहेता है । पेट की सूजन या पतले दस्त होने पर दहीं को जायफल या भुने हुए जीरे के साथ लेने का आयुर्वेदिक उपचार भारत मे काफी दशको से प्रचलित है ।

एक रिसर्च के मुताबिक दही में जीवित बैक्टीरिया, या प्रोबायोटिक्स होते हैं । जिनके सेवन करने पर ये पाचन स्वास्थ्य को लाभ पहुंचा सकते हैं । दुर्भाग्य से, बाज़ार मे मिलते काफी सारे दहि प्रोडक्टस को पास्चुरीकृत किया जाता है, जो एक गर्मी का उपचार है जिनसे  लाभकारी जीवाणु - प्रोबायोटिक्स  मर जाते है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपके दही में प्रभावी प्रोबायोटिक्स शामिल हैं आपको दहीं के लेबल पर सूचीबद्ध की माहिती को सही तरह से पढ़ना होगा । अगर उनमे प्रोबायोटिक्स मौजूद रहेंगे तो वो निश्चित ही पेक पर लिखा होगा ।

4.    हड्डियों और ह्रदय के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी : दहीं vitaD से भरपूर होने की वजह से हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए फायदेमंद होता है । एक रिसर्च के मुताबिक दहीं के नियमित सेवन से ह्रदय की धमनियों मे वसा बढ़ती नहीं है । इसलिए उच्च रक्तचाप और कॉलेस्ट्रोल से संबन्धित बीमारियों से दूर रहा जा सकता है ।

5.    त्वचा और बालों के लिए उपयोगी : दहीं मे मौजूद कई सारे खनिज तत्व और vitamins की वजह से त्वचा और बालों पर लगाने से उन्हे पोषण देता है । बालों और त्वचा को योग्य मात्र मेन नमी प्रदान कर उन्हे तरोताजा बनाता है । बालों मे रूसी दूर करने के लिए और त्वचा से जुरियाँ निकलने के लिए दहीं का उपयोग हर घर मे सालों से किओया जाता है ।



दहीं का पानी :

            आयुर्वेद के अनुसार दहीं का पानी पचने मे हल्का होता है । इससे पाचन शक्ति अच्छी बनती है और कब्ज दूर होती है । अच्छी तरह से जमी हुई दहीं का ही पानी सेवन करना चाहिए ।

 

दहीं खाते समय यह खास ध्यान रखें :

    दहीं फायदेमंद खुराक जरूर है , लेकिन सभी को यह शायद फायदा ना भी दे सके । आयुर्वेद के अनुसार दहीं खाने के कुछ नियम हैं । अगर इन नियमों के अलावा दहीं खाया गया तो कहीं न कहीं यह दुष्प्रभाव भी दिखा सकता है । आइये जानते हैं की दहीं को कैसे खाया जाए और दहीं से क्या क्या दुष्प्रभाव देखने मिलते है :

·      दहीं आयुर्वेद के अनुसार रात मे नहीं खा सकते है ।

·      शरद, गरमी और वसंत ऋतु मे दहीं पीना मना है ।

·      दहीं जब भी खानी हो तब उसके साथ शक्कर, मिश्री, नमक, मूंग दाल या काली मिर्च डालकर ही लेने से दहीं के खराब गुण शरीर को नहीं मिलेंगे ।

·      दहीं को गरम कर के कभी भी नहीं खाना चाहिए। बाहर धूप से आकार तुरंत दहीं का सेवन भी नहीं करना उचित होगा।

·      जिनकी पाचक क्षमता कमजोर है उन्हे दहीं पचाने मे भरी पड सकता है । ऐसे समय पर कम मात्र मे और काली मिर्च डालकर दहीं खाना उत्तम होगा ।

·      आधा जमा हुआ – कच्चे दहीं का सेवन कदापि न करें । आयुर्वेद के अनुसार आधा जमा हुआ दहीं त्रिदोष को असंतुलित कर रोग पैदा करता है ।

·      दहि अगर खट्टा हुआ तो वो एसिडिटि, त्वचा विकार और हड्डियों मे दर्द भी पैदा कर सकता है ।

·      एक संशोधन के अनुसार हररोज दहीं खाने वाले व्यक्तियों मे मोटापा और उससे होने वाली बीमारयो की परेशानी ज्यादा देखने मिलती है ।

·      जिन महिलाओं को माहवारी संबंधित विकार हो उन्हे आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह से दहीं खाना बंद करना चाहिए ।

·      ऊपर बताए दहीं के लाभ सभी लोगो को एक समान लागू नहीं होते हैं । दहीं ह्रदय रोग , त्वचा विकार या जुकाम आदि रोगों मे फायदेमंद नहीं भी हो सकता है । कुछ लोगो मेँ दहीं से ह्रदय की – कफ की और त्वचा संबंधित बीमारियाँ बढ़ जाती है । इसलिए आयुर्वेद डॉक्टर की सलाह से अपनी प्रकृति – Body Constitute जानकार ही दहीं का चिकित्सा की तरह उपयोग करना उचित होगा ।


To read this article in English : https://www.thelitthings.com/2020/09/health-benefits-side-effects-curd-dahi.html 


- डॉ. जिगर गोर ( आयुर्वेद विशेषज्ञ ) 

श्री माधव स्मरणम आयुर्वेद चिकित्सालय